अनुरंजन झा सीईओ, मीडिया सरकार

सरकार ने अचानक आर्थिक आधार पर आरक्षण का फैसला किया जिसके बाद हर तरफ इसी की चर्चा होने लगी। साथ ही इस पूरे मामले पर झूठ और भ्रम भी फैलाया जाने लगा । इसलिए आप आरक्षण पर फैलाये जा रहे झूठ और भ्रम से बचिए …. बिन्दुवार इन मुद्दों से मामला समझिए –

1- यह सिर्फ हिंदुओं के लिए नहीं.. इसमें हिंदू-मुसलमान-सिख और ईसाई सब शामिल हैं

2- सालाना 8 लाख के आय से नीचे वाले और पांच एकड़ जमीन से कम वाले सभी “गरीब सवर्ण” के दायरे में हैं

3- जाति के आधार पर आरक्षण की सीमा ५० फीसदी निर्धारित है, आर्थिक आधार पर नई सीमा निर्धारित की जा सकती है ।

4- जरुरत पड़ने पर संविधान में संशोधन किया जा सकता है … संशोधन पर कोई रोक नहीं है, लेकिन मौलिक अधिकारों में छेड़छाड़ संभव नहीं है।

5- जो यह हवाला दे रहे हैं कि संविधान पचास फीसदी से ज्यादा आरक्षण की इजाजत नहीं देता वो यह बात दबा रहे हैं कि पहली बार महज १० साल के लिए आरक्षण की व्यवस्था दी गई थी। जिसे संशोधन के जरिए ही बदला गया।

6- अगर आर्थिक आधार पर आरक्षण करना है तो जातिगत आरक्षण खत्म करना चाहिए।

7- बिना जातिगत आरक्षण खत्म किए आर्थिक आरक्षण दिल बहलाने के लिए है.. क्यूंकि इस दायरे में तकरीबन ८० फीसदी जनता आती है।

8- सरकार जिन मुद्दों के खिलाफ ५ साल तक रही, अपनी उन्हीं नीतियों के खिलाफ जाने का फैसला महज चुनावी स्टंट है।

9- जब अमित शाह तेलंगाना में मुस्लिमों के आरक्षण के खिलाफ संविधान का रोना रो रहे थे तो अब अचानक वो कैसे पूरा हो गया।

10- अपने पांच साल के सभी भाषणों में प्रधानमंत्री ने आरक्षण के साथ अटल रहने की प्रतिबद्धता दोहराई थी तो अब अगर सवर्णों को आरक्षण मिलेगा तो किसका हिस्सा कटेगा।
— कुल मिलाकर Sunday को पकाई गई भीम खिचड़ी के बाद यह खीर है जो बेस्वाद है .. आरक्षण का आधार सिर्फ आर्थिक होना चाहिए । मैं हर बार यही कहता हूं कि धरती पर सिर्फ दो जातियां होती हैं… एक सफल और दूसरी असफल… लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि असफल व्यक्ति सफल होते ही दूसरे पाले में जा खड़ा होता है . यही समाज का बुनियादा ढांचा और उसकी बुनियादी खोट है ।

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