फिल्म की शुरुआत साइलेंट कास्टिंग रोल से होती है, जो कि आम तौर पर प्रचलित तरीका नहीं है। इसी से स्पष्ट हो जाता है कि निर्देशक आपको एक गंभीर माहौल में ले जाना चाहता है।

महिला सशक्तीकरण पर पहले भी कई फिल्में बनी हैं, जैसे अर्थ, मिर्च मसाला, मृत्युदंड और डोर से लेकर क्वीन और इंग्लिश विंग्लिश तक। लेकिन पिंक वाकई इन सबसे अलग है। अलग इस अर्थ में कि यह फिल्म आज की बोल्ड और आत्मविश्वास से भरी उन स्त्रियों की बात करती है, जो यह साबित करना चाहती हैं कि वे हर दृष्टि से मर्दों के बराबर हैं।

कहानी में चार प्रमुख किरदार हैं। तीन लड़कियां और एक उनका हमदर्द, जो उनकी आज़ादी के लिए लड़ता है और बाकी दुनिया से संघर्ष करता है। फिल्म के वे दृश्य और डायलॉग्स अधिक तालियां बटोरते हैं, जिनमें औरतों को लेकर मर्दों के प्रचलित विचारों को चुनौती दी गई है। हालांकि इस लिहाज से पिंक एक पीढ़ी आगे की फिल्म लगती है, क्योंकि समाज का परसेप्शन रातों-रात नहीं बदलता। इसमें वक्त लगता है।

pink2अमिताभ बच्चन की भूमिका फिल्म में शुरू से ही स्पष्ट है और आप इसका अंदाज़ा पहले ही लगा सकते हैं। मुझे लगता है कि यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से नहीं है, लेकिन तापसी के लिए निश्चित रूप से यह फिल्म बेहतरीन है, जिन्होंने अपने किरदार को शानदार तरीके से निभाया है। एक भी फ्रेम में वह अपने कैरेक्टर से बाहर नहीं निकली हैं और मेरी राय में वह बहुत आगे जाएंगी। हालांकि यह थोड़ी जल्दबाज़ी होगी कि बड़ी अभिनेत्रियों से उनकी तुलना की जाए, लेकिन हां, उनमें दम तो है। अन्य लोगों ने भी संतोषजनक काम किया है, लेकिन पीयूष मिश्रा ने मुझे बेहद निराश किया। उनके जैसे कलाकार से इतने साधारण प्रदर्शन की उम्मीद हम नहीं करते।

अनिरुद्ध रॉय चौधरी निर्देशित फिल्म पिंक उतनी अपीलिंग तो नहीं है, जितनी कि इसकी पब्लिसिटी की गई थी। बैकग्राउंड संगीत बढ़िया है। जब फिल्म अनावश्यक खिंचने लगती है और उबाऊ हो जाती है, उस वक्त यह आपको थामकर रखता है। आज के दर्शकों को ध्यान में रखते हुए फिल्म के संवाद अच्छे कहे जाएंगे। सिनेमेटोग्राफी भी अच्छी है, लेकिन एडिटिंग थोड़ी और बेहतर व कसावट भरी हो सकती थी।

फिल्म का क्लाइमैक्स वैसा ही है, जैसा फिल्म देखते हुए आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। एक पुरुष (अमिताभ बच्चन) अन्य पुरुषों के ख़िलाफ़ महिलाओं की लड़ाई जीतता है। अंत में, दमदार तरीके से महिलाओं की लड़ाई लड़ने के लिए एक महिला कांस्टेबल अमिताभ बच्चन से हाथ मिलाकर उन्हें धन्यवाद देती है। यह दृश्य काफी प्रभावशाली है।

बहरहाल, यह फिल्म आप तापसी के लिए देख सकते हैं। सिर्फ़ मनोरंजन के लिए देखना चाहते हैं, तो यह आपके लिए नहीं है।

**½  और ½ तापसी के लिए।

मनीष झा जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं।

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