अनुरंजन झा, सीइओ, मीडिया सरकार

अपनी आदत के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबको चौंकाते हुए और मीडिया को छकाते हुए राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार के तौर पर रामनाथ कोविंद का नाम आगे कर दिया। मोदी और अमित शाह के इस फैसले, संघ की उस पर मुहर और रामनाथ कोविंद पर चर्चा से पहले मैं यह साफ कर दूं कि रामनाथ कोविंद सज्जन व्यक्ति हैं और उनसे हमारा कोई व्यक्तिगत राग-द्वेष नहीं है बल्कि एक जमाने से मधुर संबंध रहे हैं और जब उनको पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने प्रवक्ता की जिम्मेदारी दी थी तब वो हमारे टीवी प्राइम टाइम शो के नियमित मेहमान भी हुआ करते थे। इसलिए कुछ त्थयात्मक बातें करते हैं।

भारतीय जनता पार्टी का एक बड़ा धड़ा सुबह तक इस आस में बैठा था कि शायद पार्टी के मार्गदर्शक लाल कृष्ण आडवाणी को इस पद के लिए आगे कर दिया जाए औऱ आखिरी समय में नरेंद्र मोदी गुरुदक्षिणा के तौर पर आडवाणी को रायसीना हिल्स पहुंचा दें। जो नहीं हुआ बिहार के मौजूदा राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा कर दी गई। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करते हुए उनके दलित होने पर ज्यादा जोर दिया। क्योंकि उनकी समझ से यही रामनाथ कोविंद की सबसे बड़ी प्रतिभा है। थोड़े ही समय में सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर उनकी तारीफ में कसीदे पढ़े जाने लगे और उनकी सहजता का लाभ उठाकर उनके साथ तस्वीरें खिचवा चुकी पूरी जमात ने सोशल मीडिया को कोविंदमय कर दिया। हालांकि जिन लोगों ने उनके साथ तस्वीरें चस्पा की उऩमें से ज्यादातर को अभी तक यह नहीं मालूम रहा होगा रामनाथ कोविंद दलित हैँ। तो आखिर किन खूबियों की वजह से नरेंद्र मोदी और उऩकी टीम ने रामनाथ कोविंद के नाम पर मुहर लगाई।

संघ और उससे जुड़े लोग पिछले कुछ महीनों से लगातार इस चर्चा को बल दे रहे थे कि इस बार राष्ट्रपति कोई संघ की विचारधारा को मानने वाला होना चाहिए। कुल जमा पच्चीस साल का सक्रिय राजनैतिक सफर रहा है रामनाथ कोविंद का, मीडिया के लोगों ने पहली बार रामनाथ कोविंद को तब जाना जब यूपीए-२ की सरकार के समय बीजेपी द्वारा मीडिया से बात करनेवालों की सूची में जगह पाए हालांकि उससे पहले दो बार लगातार राज्यसभा के सदस्य रह चुके थे लेकिन कोई राजनीतिक पहचान नहीं थी। नब्बे के दशक में राजनीति में आऩे से पहले वकालत कर रहे थे और आरएसएस के सक्रिय सदस्य भी नहीं थे प्रचारक होने का तो सवाल ही नहीं होता। दोबारा कोविंद को लोगों ने तब जाना जब २०१५ में उऩ्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया। भले रामनाथ कोविंद संघ के सक्रिय सदस्य नहीं रहे हों लेकिन मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने से पहले उऩके निजी सहायक रहे और कांग्रेस के सीनियर लीडर हितेंद्र देसाई जो १९६५-७१ तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, के घर में लंबे समय तक रहे जाहिर है कि देसाई में कोविंद जी को एक अभिभावक दिखता होगा और कांग्रेसी देसाई का रामनाथ कोविंद पर ऐसा असर रहा कि उनके जीते जी कोविंद भारतीय जनता पार्टी से नहीं जुड़ पाए।

जाहिर है पर्याप्त राजनैतिक अनुभव, दलीय प्रतिबद्धता और लंबे सामाजिक जीवन या फिर जनाधार और अनोखी प्रतिभा जैसे मुद्दों को दरकिनार कर ही बीजेपी ने रामनाथ कोविंद का नाम आगे किया है। तो क्या इस बार भारतीय जनता पार्टी से एपीजे अब्दुल कलाम जैसे नाम की उम्मीद नहीं थी और यह पार्टी भी कांग्रेस के ज्ञानी और प्रतिभा की तरह ही रबर स्टांप चाहती थी। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस की तरह सिर्फ बीजेपी को भी एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो प्रधानमंत्री के इशारे पर काम करे, पार्टी के इशारे पर काम करे बल्कि इस बार एक ऐसे कद का व्यक्ति चाहिए था जिसका कद भारतीय जनता पार्टी के मुखिया के कद से भी बड़ा न हो, संघ के दोयम दर्जे के नेताओं के कद के बराबर भी न हो निश्चित तौर पर ऐसा नाम खोजना आसान नहीं रहा होगा।  जबकि यह साफ हो चुका है कि पार्टी विद डिफरेंस का ढोल पीटती आ रही बीजेपी वही सारे तौर-तरीके अपना रही है जो सालों से कांग्रेस करती रही है तो ऐसे में थोड़े समय बाद जनता को यह महसूस होने लगे कि नकल करने वालों से असल ही बेहतर हैं तो समस्या खड़ी हो सकती है। हालांकि विपक्ष में एकजुटता नहीं है और लीडर के तौर पर कोई करिश्माई चेहरा नहीं तो यह सबसे मुफीद वक्त था इतिहास लिखने का, बीजेपी को उसी की धार से काटने का लालकृष्ण आडवाणी को विपक्ष के चेहरे के तौर पर किसी भी कीमत पर तैयार करने का क्योंकि बात देश की संप्रभुता की है, मैं आडवाणी के नाम की सिफारिश इसलिए कर रहा हूं क्योंकि उऩके नाम पर निश्चित तौर भारतीय जनता पार्टी के अंदर काफी नेताओँ का जमीर जागता औऱ वो चुपके चुपके आडवाणी के पक्ष में लामबंद हो जाते। चुंकि राष्ट्रपति के चुनाव में पार्टी व्हिप जारी नहीं हो सकता इसलिए यह बहुत मुश्किल नहीं होता।

ऐसा होना इसलिेए भी जरुरी है क्योंकि राष्ट्रपति पद के लिए जिन योग्यताओं की बात आज बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने की है उससे देश का भला नहीं हो सकता। आखिर देश के चुने हुए प्रतिनिधियों को देश का पहला नागरिक चुनना है न कि ऐसा व्यक्ति जो महज सामान्य ज्ञान की किताबों की शोभा बढ़ाए।

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