अनुरंजन झा लेखक वरिष्ठ पत्रकार औऱ सामाजिक चिंतक हैं

वैसे तो अपना देश बारहों मासा चुनाव के मोड में रहता है लेकिन इन दिनों सरगर्मियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। जाहिर है भाजपा शासित तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और उसके ठीक बाद लोकसभा चुनाव हैं जहां सत्तर साल बनाम पांच साल की लड़ाई होने वाली है। हालांकि उन सत्तर सालों में वाजपेयी जी के छ साल भी शामिल हैं लेकिन मौजूदा भाजपाई टीम अटल जी की अस्थियों की राख को चार क्विंटल वजनी बनाने में,  चार हजार से ज्यादा कलश देश भर में घुमाने में हाड़-तोड़ मेहनत कर सकती है लेकिन उनके कार्यकाल को वो कांग्रेस के कार्यकाल के साथ ही सत्तर सालों में समेट देने में गुरेज नहीं करती।

कभी खीर कभी खिचड़ी से मज़ा बेस्वाद होगा

दिसंबर जनवरी में मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के अलावा मिजोरम में भी चुनाव होंगे। लेकिन चुनावी सुर्खियां बटोर रहा है सुशासन बाबू का बिहार । वैसे तो बिहार में विधानसभा २०२० के अक्टूबर-नवंबर में होने निर्धारित हैं मगर वो कब होंगे यह २०१९ के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट से ज्यादा गठबंधन किस करवट बैठेगा उस पर निर्भर करने वाला है। बिहार से जुड़े नेताओं के हालिया बयानों को गौर से देखें तो अभी महज कयास लगाए जा रहे हैँ। दूसरी पार्टियों की बैसाखी पर बार-बार सवार होकर बड़े भैया बने रहने की जबरदस्त हुनर के बावजूद इस बार लोकसभा चुनाव में सुशासन बाबू की दाल कुछ कुछ अधपकी रहने वाली है क्योंकि केंद्र सरकार में मंत्री औऱ एनडीए के घटक दल के नेता उपेंद्र कुशवाहा भी अलग खीर पकाने में लगे हैँ। हालांकि सुशासन बाबू अपने पुराने मित्र और घटक के दूसरे नेता रामविलास पासवान के जरिए कुशवाहा की खीर को खिचड़ी में तब्दील करने की कोशिशों में जुटे हैं।  कभी खीर तो कभी खिचड़ी बनाने के चक्कर में जिसका मजा बेस्वाद होने वाला है – वो है भारतीय जनता पार्टी । गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक ४० सीटों वाले बिहार में बीजेपी २० सीटों पर चुनाव लड़ेगी, साफ है कि मौजूदा २२ सांसदों वाले बिहार में बीजेपी अपने दो नेताओं को तो चुनाव से पहले ही कुर्बान कर रही है। जाहिर है बिहार की माटी ऐसी नहीं है और न ही इतिहास ऐसा रहा है कि वहां बीजेपी अपना स्ट्राइक रेट सौ फीसद रख पाए तो ऐसे में साफ है पार्टी को बहुत बेहतर रिजल्ट के बाद भी मौजूदा लोकसभा के मुकाबले बिहार में ही  कम से कम पांच सीटों का नुकसान होने जा रहा है। ऐसे में जहां उत्तर पूर्व के राज्यों के एक-दो सीटों पर बीजेपी कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती वहां बिहार जैसे प्रदेश में ऐसे नुकसान को कैसे बर्दाश्त करेगी, और इतना कम नुकसान भी तब होगा जब उपेंद्र कुशवाहा अपनी खीर में नमक डाल कर उसे खिचड़ी बना लें या फिर गठबंधन की खिचड़ी में चीनी डाल कर उसे खीर समझ कर ग्रहण कर लें।

कुशवाहा आसानी से मानेंगे नहीं

बिहार की राजनीति में हमेशा से जबरदस्त दखल रखने की मंशा वाले उपेंद्र कुशवाहा के लिए यह आसान नहीं होगा कि तीन सीटों की जीत के बाद अब बंटवारे में दो सीट पर संतोष कर लें। जातिगत आंकड़ों और वोट शेयर के मद्देनजर कुशवाहा का दखल और प्रभाव सुशासन बाबू नीतीश कुमार से कम नहीं है और रही बात छवि की तो वो भी बेदाग है या यूं कहिए कि अभी वर्जिन है। सुशासन बाबू अपनी छवि का इस्तेमाल इतनी बार कर चुके कि इस बार उसका लाभ उनको मिलेगा इसके आसार कम हैं। पहले बीजेपी फिर राजद और फिर बीजेपी की सभी वैसाखियों के डंडे अब नीतीश कुमार के लिए कमजोर हो गए हैँ। हालांकि इन वैसाखियों के सहारे वो प्रदेश के मुखिया तो बनते रहे हैं लेकिन साथ ही अपना जनाधार भी खिसकाते रहे हैं। दूसरी तरफ कुशवाहा समाज का लगभग ४-५ फीसदी वोट उपेंद्र कुशवाहा के इर्द-गिर्द ही घूमता नजर आता है। दूसरी तरफ प्रदेश के जिन ५ फीसदी कुर्मी वोट को नीतीश कुमार अपना मान बैठे हैं उसमें भी इस बार कुशवाहा अपने नए नए तरीकों से सेंध लगाने में जुटे हैं। हालांकि बीजेपी सरदार पटेल के नाम पर उस वोट पर नजर टिकाए हुए है जिसे यह समाज अपना आदर्श मानता है। नीतीश कुमार के इस बार राजद से अलग होकर मोदी की गोदी में आने के पीछे बिहार के पटेल समाज में बीजेपी के बढ़ते दबदबे का आतंक भी था। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि कुर्मी का जो सॉलिड वोट बैंक नीतीश कुमार के साथ वो दरक चुका है।

वैसे तो पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए ने रामविलास पासवान और दूसरे दलित नेता जीतनराम मांझी को एक साथ अपने पाले में रखा था लेकिन वो राजद-कांग्रेस और जेडीयू के महागठबंधन की काट नहीं बन पाए क्यूंकि प्रदेश के मुसलमान एकजुट उनके पाले में खड़े थे। अब समीकरण बदल गए हैं। अब मुसलमानों के नाम मात्र वोट ही जेडीयू को मिलेंगे वो भी तब जब उनकी जाति का कोई मजबूत उम्मीदवार मैदान में हो। साथ ही मांझी भी अब दूसरे पाले में खड़़े हैं हालांकि वो महज पच्चीस लाख वोट की नुमाइंदगी करते हैं और रामविलास पासवान की काट नहीं बन सकते हैं। फिर भी बिहार में दलित नेता के तौर पर रामविलास पासवान के परिवार के बाहर कुछ दिखता नहीं है। उनके अभिनेता -सांसद पुत्र से थोड़ी उम्मीद जगी थी लेकिन पिछले पांच साल की राजनीति में उनका कोई ऐसा करिज्मा नहीं दिखा कि वो दलित वोट बैंक को इकट्ठा रख सकें ऐसे में यह बड़ा वोट बैंक टुकड़ों में बटेंगा, स्थानीय नेताओं का असर होगा और कुछ सीटों पर जीतनराम भी असर डालेंगें।

अगर मनमाफिक सीट नहीं मिलने से उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए का दामन छोड़ा तो वो जरुर अपने वोट बैंक को एकजूट रखते हुए सभी पिछडी जातियों और दलितों को एक हद तक रिझाने में सफल होते हुए दिखेंगे। साथ ही उनकी रणनीति में बिहार के बाहर के दलित नेता भी होंगे जो बिहार में असर डालेंगे। ऐसे में सुशासन बाबू बीजेपी के साथ मिलकर जैसी खिचड़ी बनाना चाहते हैं वो उनके साथ साथ बीजेपी के लिए भी कड़वी साबित होगी। बेहतर होगा कि वो कुशवाहा की खीर बनने दें और थोड़ा अपना गुड़ भी उसमें डालें ताकि उसकी मिठास का मजा वो भी ले सकें नहीं तो बीजेपी तो मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू पर यकीन करती है।

(यह लेख रिपब्लिक हिंदी वेबसाइट से साभार लिया गया है)

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