देश के युग पुरूष का अंत हो गया। अटल हमेशा अमर रहेंगे। भले ही वो हमारे बीच शरीर से न हो, लेकिन उनकी विशाल शख्सियत हमारे  बीच रहेगी। उन की प्रेरणादायक कविताएं, उनका पगचिन्ह, उनकी सीख हमेशा देश के साथ रहेगी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपनी कविताओं के जरिए अपने  दोस्तों से लेकर दुश्मनों को शांत कर देते थे। उनकी कविताओं  के शब्द  ऐसे  होते थे जो  दोस्तों को भी सोचने पर मजबूर  कर देता था कि आखिर अटल क्या कहना चाहते  हैं।  अटल ने कई ऐसी कविताएं लिखी  जो लोगों के लिए  प्रेऱणा  की  स्त्रोत  हैं, वहीं कुछ कविताएं ऐसी भी हैं, जिसे  लेकर काफी विवाद भी हुआ। उन्हीं  में से एक कविता हैं जो उन्होंने इमरजेंसी के दौरान  लिखी। जब इंदिरा गांधी ने  देश में इमरजेंसी का फैसला किया तो उस दौरान न केवल सियासी असर पड़ा इंदिरा गांधी के फैसले ने लोगों के निजी जीवन तक को झगझोर कर रख दिया। इमरजेंसी के  दौरान नसबंदी का फैसला लिया गया। इंदिरा गांधी ने इस की जिम्मेदारी अप ने छोटे  बेटे संजय गांधी को सौंपी। एक रिपोर्ट के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान देशभर में 60 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कराई गई। 16 साल के किशोर से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक की जबरदस्ती नसबंदी करवाई गई। इस फैसले से उस वक्त देश  में आतंक जैसा माहौल बन गया था। इसी दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नसबंदी की आलोचना में एक कविता तक लिखी थी। हालांकि इस कविता को लेकर  काफी आलोचनाएं हुई थी। उनकी इस कविता में इंदिरा गांधी के इस फैसले के खिलाफ आक्रोश भरा था।  इस कविता के बोल थे, आओ मर्दो, नामर्द बनो. यह कविता काफी चर्चा में रही।

इमरजेंसी के दौरान लिखी अटल की कविता

आओ! मर्दों नामर्द बनो
मर्दों ने काम बिगाड़ा है,
मर्दों को गया पछाड़ा है
झगड़े-फसाद की जड़ सारे
जड़ से ही गया उखाड़ा है.

मर्दों की तूती बन्द हुई.
औरत का बजा नगाड़ा है.
गर्मी छोड़ो अब सर्द बनो.
आओ मर्दों, नामर्द बनो.

गुलछरे खूब उड़ाए हैं,
रस्से भी खूब तुड़ाए हैं,
चूं चपड़ चलेगी तनिक नहीं,
सर सब के गए मुंड़ाए हैं,
उलटी गंगा की धारा है,
क्यों तिल का ताड़ बनाए है,
तुम दवा नहीं, हमदर्द बनो.
आयो मर्दों, नामर्द बनो.

औरत ने काम संभाला है,
सब कुछ देखा है, भाला है,
मुंह खोलो तो जय-जय बोलो,
वर्ना तिहाड़ का ताला है,
ताली फटकारो, झख मारो,
बाकी ठन-ठन गोपाला है,
गर्दिश में हो तो गर्द बनो.
आयो मर्दों, नामर्द बनो.

पौरुष पर फिरता पानी है,
पौरुष कोरी नादानी है,
पौरुष के गुण गाना छोड़ो,
पौरुष बस एक कहानी है,
पौरुषविहीन के पौ बारा,
पौरुष की मरती नानी है,
फाइल छोड़ो, अब फर्द बनो.
आओ मर्दों, नामर्द बनो.

चौकड़ी भूल, चौका देखो,
चूल्हा फूंको, मौका देखो,
चलती चक्की के पाटों में
पिसती जीवन नौका देखो,
घर में ही लुटिया डूबी है,
चुटिया में ही धोखा देखो,
तुम कलां नहीं बस खुर्द बनो.
आयो मर्दों, नामर्द बनो.

 

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