नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी के लिए नया कानून तो लागू कर दिया, लेेकिन इस नए कानून का भी जमकर विरोध हो रहा है। आइए जानते हैं कि वे शराबबंदी कानून के वे ग्यारह प्रावधान, जिन्हें लेकर लोगों में एक किस्म की बेचैनी भी है और काफी हद तक नाराज़गी भी है।
1. चैप्टर तीन में कहा गया है कि शराब या मादक पदार्थों  के सेवन, व्यापार, परिवहन, उत्पादन, बिक्री, प्रचार या अन्य किसी तरह के अवांछित क्रियाकलाप में संलग्न पाया जाना संज्ञेय और गैर जमानती अपराध माना जाएगा। धारा 47 के तहत इसपर विस्तृत तरीके से जेल और आर्थिक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इस कानून की आत्मा ही चैप्टर तीन को माना  गया है। इसे किसी भी तरह से तोड़ा जाना कानून का उल्लंघन माना जाएगा। पटना हाई कोर्ट ने भी सबसे ज्यादा एतराज ऐसे ही प्रावधान पर जताया था, क्योंकि इसकी आड़ में आम जन के अधिकार, स्वतंत्रता, निजता और जीने के अधिकार पर आघात लगाया जा सकता है।
2. चैप्टर छह के मुताबिक शराब या मादक पदार्थों का व्यापार गैरकानूनी होगा, जिसमें निर्माण से लेकर रखना और बेचना तक अपराध की श्रेणी में आएगा। इसके लिए सजा और जुर्माना दोनों का प्रावधान है।
3. चैप्टर आठ के तहत कानून को अधिकार होगा कि अपराध का पता लगाने के नाम पर, उसके अनुसन्धान और अन्वेषण के नाम पर या किसी भी विचारण के लिए बिना किसी अनुमति के किसी के भी घर में बिना इजाजत घुसने, जाँच करने, सामान या संपत्ति जब्त करने और बिना वारंट गिरफ्तार करने का अधिकार होगा। इसे इस कानून की सबसे तुगलकी धारा माना जा रहा है, और पुलिस में बैठे लोग पैसे ऐंठने के लिए बड़े पैमाने पर इसका दुरुपयोग कर भी रहे हैं।
4. नए प्रावधानों के अनुसार शराब के व्यवसाय में लिप्त पाए जाने वाले किसी भी शख्स पर ग़ैरज़मानती संज्ञेय अपराध के तहत करवाई होगी। किसी भी घर या स्थल पर शराब पाई गई, तो पूरा परिवार दोषी होगा। पिछले कानून की जद में बच्चे भी आ जाते थे, लेकिन नए कानून में बच्चों को छोड़ दिया गया है। सिर्फ़ बालिग लोग धरे जाएंगे। इस तरह के मामले में शराब-व्यापार का मामला बनाते हुए अधिकतम दस साल की जेल और एक लाख से दस लाख तक का जुर्माना लगाया जाएगा।
5. किसी एक या एक से अधिक अवयस्क को शराब पेश किया गया तो सात से दस साल की कैद और दस लाख तक का जुर्माना  लगाया जाएगा।
6. किसी पब्लिक प्लेस पर शराब पीते पकडे गए तो पाँच से दस साल की कैद और एक से पांच लाख तक जुर्माना लगाया जाएगा।
7. किसी भी तरह से महिला या बच्चों को शराब व्यवसाय में लगाया गया तो पांच से सात साल की कैद और दस लाख रुपये का जुर्माना  भरना पड़ेगा।
8. किसी जगह अगर शराब की पार्टी का आयोजन किया तो संलिप्त पाए गए सभी लोगों को दस साल से लेकर आजीवन कारावास और दस लाख रुपये का जुर्माने का प्रावधान है।
9. विषाक्त शराब से मौत पर पीड़ित परिवार को चार लाख का मुआवजा मिलेगा, जो आरोपियों और दोषियों से वसूला जाएगा। इसके लिए मौत की सज़ा तक का प्रावधान किया गया है।
10. शराब ढोने वाले किसी भी जानवर या वाहन को जब्त कर लिया जाएगा।
11. एक बार दोषी पाए जाने के बाद दुबारा पकड़े जाने पर सज़ा और जुर्माना दोनों दुगुना होगा।
अब समूचे राज्य में विपक्ष समेत बड़ी संख्या में लोग हैं, जो उपरोक्त प्रावधानों को न सिर्फ़ अव्यावहारिकता की हद तक कड़ा मानते हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर इनके दुरुपयोग की आशंका भी जता रहे हैं। उनका कहना है कि किसी घर में शराब मिलने पर सभी बालिग लोगों को कैसे आरोपी बनाया जा सकता है? क्या ये जरूरी है कि परिवार का हर सदस्य शराबी हो या शराब का व्यापार करता हो? सम्मिलित परिवार में क्या सबपर मामला चलेगा? क्या एक ही आंगन में रहने वाले सभी लोग दोषी होंगे?
पिछले कानून को निरस्त करते हुए कोर्ट ने भी ये माना कि इसमें कई खामिया हैं। जैसे, यह आम लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है। इसमें अनुच्छेद 14,  जो लोगों को समानता और अपनी तरह से जिंदगी जीने का अधिकार देता है, उसका उल्लंघन साफ दिखाई देता है। इस कानून से आम जन की स्वतंत्रता, खाने-पीने की आजादी और निजता का हनन होता है।
रद्द हुए कानून की तरह नए कानून में भी सामूहिक जिम्मेदारी और जुर्माने की बात कही गयी है। सवाल उठता है कि आखिर कौन तय करेगा जिम्मेदारी और कैसे वसूला जाएगा सामूहिक जुर्माना? जिस संपत्ति जब्ती की बात की गयी है, वह भी व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि घर में अगर महुआ, गुड़, सड़े चावल आदि मिले, तो लोग शराब बनाने के दोषी समझे जाएंगे। सवाल यह भी है कि इस कानून का दुरुपयोग नहीं होगा,  द्वेषवश किसी को फंसाया नहीं जाएगा और पुलिस पूर्वाग्रह या साजिश के तहत कार्रवाई नहीं करेगी- इस बात की क्या गारंटी है?
बिहार के कानून का विरोध देश के दूसरे हिस्सों में बने कानूनों के आधार पर भी किया जा रहा है। गुजरात में भी शराबबंदी लागू है, पर वहां पब्लिक प्लेस पर शराब पीने के लिए सजा और जुर्माना कम है। वहां साठ हजार लोगों को एक सीमा तक पीने का परमिट मिला हुआ है। मेडिकल आधार पर शराब पी जा सकती है। कोई व्यावसायिक मीटिंग हो, तो शराब पीने-पिलाने की इजाज़त मिलती है। सेना के लोगों को पीने की आजादी है। पर्यटक और सूबे के बाहर से आए लोगों को पीने का परमिट मिलता है।
ज़ाहिर है शराबबंदी कानून के पक्ष में जितनी बातें हैं, उससे अधिक विरोध में हैं। ताज़ा स्थिति यह है कि पटना हाई कोर्ट ने पिछले कानून को रद्द कर दिया है और नए कानून के ख़िलाफ़ भी वहां याचिका डाली जा चुकी है। दूसरी तरफ, राज्य सरकार भी हाई कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुकी है। यानी निगाहें अब काफी हद तक सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं।

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