राम जन्मभूमि विवाद मसला कोई नया मामला नहीं है। सालों से ये विवाद चलता आ रहा है। राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद देश की सर्वोच्च अदालत के समकक्ष है। सोमवार को इसपर सुनवाई होनी है तो मामला एक बार फिर से अखबारों और टीवी चैनलोें पर ताजा हो गया। हालांकि चुनाव के नजदीक आते ही राजनीतिक दल इस मसले को हवा दे ही देते है, लेकिन हैरानी तब होती है जब खुद अयोध्या के रहने वाले इस मसले को लेकर उदासीन दिखते हैं। वर्षों से चल रहे इस विवाद की राजनीतिक फायदे हैं, जिसे राजनीतिक दल भुनाते भी है. लेकिन अयोध्यावासियों को इस विवाद में कोई रूचि नहीं ।

पिछले दिनों अयोध्या में हिन्दू नेता प्रवीण तोगड़िया के कार्यक्रम की चर्चा लोगों ने ज़रूर की, लेकिन सोमवार को अयोध्या को लेकर क्या होने वाला है, इसकी जानकारी कम लोगों को ही थी। जिन्हें थी उनका कहना था कि सुबह टीवी और अख़बार देखकर पता चला कि सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई हो रही है। मीडिया में इस विवाद से जुड़े किसी भी मसले को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना आम बात है। देश और दुनिया भर की निगाहें इस अहम विवाद के फ़ैसले पर लगी हैं, लेकिन अयोध्या के लोग इस पूरी प्रक्रिया से बेफ़िक्र हैं।

इस विवाद में बाबरी मस्जिद की ओर से पक्षकार इक़बाल अंसारी कहते हैं कि यहां के लोगों के लिए ऐसी हलचलें सिर्फ़ तकलीफ़ और नुक़सान देने वाली होती हैं और बाहरवाले लोग इसका फायदा उठाते हैं। उनका कहना है कि जब भी इस विवाद को लेकर हलचल बढ़ती है तो बाहर के लोग आते हैं और फिर अयोध्या के लोगों को बेवज़ह परेशान होना पड़ता है,जाम लगेगा, ट्रैफ़िक रुक जाएगा, दुकानें बंद रहेंगी और लोगों का रोज़ी-रोज़गार प्रभावित होगी। उनकी माने तो यहां के लोगों को इस विवाद में  कोई दिलचस्पी नहीं रहती और न ही इस विवाद की वज़ह से यहां के हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई विवाद है। कई बार बाहर से आने वाले लोगों के उकसावे की वजह से चंद लोग लड़ने-भिड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन बाकी अयोध्यावासी इस विवाद से कोई असर नहीं पड़ता है।

सारी बताते हैं, “जब भी यहां से संबंधित कुछ घटना होती है या फिर कोई आता है, अयोध्या के लोगों को बेवज़ह परेशान होना पड़ता है. जाम लगेगा, ट्रैफ़िक रुक जाएगा, दुकानें बंद रहेंगी और लोगों का रोज़ी-रोज़गार प्रभावित होगा.”

क्या कहता है अयोध्या का इतिहास

अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का विवाद आज़ादी के पहले से चला आ रहा है, लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद मामला गरमा गया। जिसके बाद केंद्र सरकार ने क़ानून बनाकर 7 जनवरी, 1993 से इसके आस-पास की 67 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया। इस अधिग्रहण में तीन गांव कोट रामचंद्र, अवध ख़ास और जलवानपुर की ज़मीन थी। सरकार के इस अधिग्रहण का मुस्लिम बोर्ड ने विरोध किया, लेकिन कोर्ट ने उनके विरोध का खारिज कर दिया। जिसके बाद 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई-कोर्ट ने इस विवाद में बड़ा फ़ैसला दिया । कोर्औट के आदेश के बाद विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन को तीन हिस्सों में बांटने को कहा गया, जिसमें एक हिस्सा रामलला विराजमान का, दूसरा निर्मोही अखाड़ा को और तीसरा हिस्सा सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड को देने का फैसला किया गया। हालांकि 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी, जिसके बाद ये मामला कोर्ट में  है।

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