सिर्फ सवर्णों के नाम पर हंगामा मचाकर समूचे आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को शिक्षा और नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण के लिए संविधान संशोधन बिल मंगलवार को लोकसभा में। सत्रह दलों ने साथ दिया जबकि महज तीन पार्टियों ने इसका विरोध किया। लोकसभा में मौजूद 326 सदस्यों में से 323 ने बिल के समर्थन में वोट दिया और महज 3 सदस्यों ने विरोध में वोट दिया।अब इसी मुद्दे पर राज्यसभा में सरकार की असली परीक्षा होनी है। यहां एनडीए का बहुमत नहीं है लेकिन विपक्ष भी इस बिल का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। अगर ऐसा होता है कि यह बिल राज्यसभा से भी पास हो जाएगा तो स्पष्ट समझिए कि 124वें संविधान संशोधन विधेयक सीधे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए जाएगा और फिर कई सारे राज्यों में इसे विधानसभा में मंजूरी की जरुरत भी नहीं होगी।

123 सदस्य से कम मोजूद हुए तो नहीं बनेगी बात
राज्यसभा में 246 सदस्य हैं और अगर सभी सदस्य वोटिंग में हिस्सा लेते हैं तो बिल को 164 वोट की जरूरत पड़ेगी।साथ में यह भी जरूरी है कि वोटिंग में कम से कम आधे सदस्य मौजूद रहे यानी कम से कम 123 सदस्यों का वोटिंग में हिस्सा लेना जरूरी है।  विपक्ष यहां अपने दबदबे का इस्तेमाल कर सकता है।

कांग्रेस कर सकती है गेम
लोकसभा में कांग्रेस ने भले ही बिल का समर्थन किया है लेकिन बहस के दौरान बिल को सिलेक्ट कमिटी को भेजने की मांग भी की थी। ऐसे में बिल पर राज्यसभा में कांग्रेस के रुख में बदलाव दिखे तो हैरानी नहीं होगी। कांग्रेस के दूसरे सहयोगी दलों ने यही मांग उठा दी तो मामला लटक सकता है।

राज्यसभा से पास तो तत्काल लागू होगा आरक्षण
अरुण जेटली ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि क्यों संविधान संशोधन बिल होने के बावजूद इसे राज्यों की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। जेटली ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में संशोधन करके नया क्लॉज जोड़ा जा रहा है, लिहाजा दोनों सदनों से पारित होने के साथ ही यह प्रभावी हो जाएगा।

50% सीमा से बाहर है यह नया आरक्षण

इस आरक्षण की घोषणा के साथ ही यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया जा रहा था कि आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास फीसदी सुप्रीम अदालत ने तय कर रखी है यह उसका उल्लंघन होगा। जबकि ऐसा नहीं है यह आरक्षण आर्थिक आधार पर है इसलिए यह बिल्कुल अलग है और यह दस फीसदी उस पचास फीसदी के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है। अभी तक संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं था। इस बार, संविधान संशोधन के जरिए यह प्रावधान किया जा रहा है, इसलिए सुप्रीम अदालत में भी कोई समस्या नहीं दिखती है।

 

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