नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने सरकारों के काम के रवैया पर सवाल उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि देश की राजधानी दिल्ली कूड़े के नीचे दबची जा रही है और आर्थिक राजदानी मुंबई पानी में डूब रही है। देश के दो प्रमुख महानगरों का हाल बेहाल हैं, लेकिन सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। इस हालात पर अपनी विवशता दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारें हाथ पर हाथ धड़े बैठी है और जब अदालतें हस्तक्षेप करती हैं, तो जजों पर आरोप लगाया जाता है। न्यायपालिका पर अतिसक्रियता का आरोप लगता है।

न्यायपालिका के तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब सरकारें कुछ नहीं कर सकती तो क्या कहा जाए। न्यायमूर्ति एम बी लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ ने सरकारों के रवैये पर अफसोस जताते हुए कहा कि सत्ता में बैठे लोग कुछ नहीं कर रहे तो क्या किया जा सकता है।

दिल्ली के बेहाल हाल पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली के गाजीपुर, ओखला और भलस्वा में कूड़े के पहाड़ पर बड़ी चिंता का विषय है। कोर्ट ने सवाल किया कि आखिर राजधानी में कूड़ा प्रबंधन की जिम्मेदारी किसकी है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाई और हलफनामा दाखिल कर जवाब दाखिल देने को कहा है। कोर्ट से सरकार से पूछा है कि आखिर कूड़े के पहाड़ को लेकर क्या किया जा रहा है। पीठ ने कहा कि अब तो उपराज्यपाल बनाम दिल्ली सरकार पर फैसला भी आ गया है, तब भी इस समस्या का निपटारा क्यों नहीं हो पा रहा है।

कोर्ट ने दिल्ली सरकार को बुधवार तक इस मसले पर अपनी राय रखने को कहा है। कोर्ट ने सरकार ने उसके एक्शन प्लान के बारे में जानकारी मांगी है कि आखिर कैसे इस कूड़े के पहाड़ से निपटा जाएगा। सरकार इसके लिए क्या प्लान तैयार कर रही है। इससे पहले पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली समेत सभी राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों को हलफनामा दायर कर जवाब दाखिल करने को कहा था, लेकिन राज्य सरकारों के रवैये पर नाराजगी जताते हुए पीठ ने कहा कि लोग डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया से मर रहे हैं, लेकिन सरकार को इसकी चिंता नहीं है। ऐसे में कोर्ट ने पूर्व आदेशों और कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करने पर हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर बिहार आदि राज्यों को सुप्रीम कोर्ट ने एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

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