जुलाई 2012 में बिहार-झारखंड के समाचार चैनल “आर्यन टीवी” का संपादक रहते हुए हमने चैनल के सहयोगियों के साथ मिलकर “पटना गैंगरेप” की पीड़ित लड़की की लड़ाई लड़ी। तब भी सरकार, पुलिस सबकी असंवेदनशीलता का ऐसा ही नज़ारा था, जैसा कठुआ की घटना में नज़र आ रहा है, फिर भी करीब दो हफ्ते तक लड़ते-लड़ते हमने बिहार के आम नागरिकों, महिलाओं, बुद्धिजीवियों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं अन्य लोगों को लामबंद किया और अंततः 6 आरोपियों को गिरफ्तार करवाया, लेकिन पीड़ित लड़की का नाम, चेहरा, जाति, धर्म कभी सामने लाने की कोशिश नहीं की।

पांच-छह महीने बाद, दिसंबर 2012 में दिल्ली में गैंगरेप की एक और नृशंस घटना घटी, जिसे शुरुआत में “दिल्ली गैंगरेप” के नाम से जाना गया और इस मामले में पीड़ित लड़की को इंसाफ़ दिलाने के लिए पूरे देश ने मिलकर लड़ाई लड़ी। कुछ अति-उत्साही लोगों ने पीड़ित लड़की का नाम लेने की गलती ज़रूर की, लेकिन फिर भी अधिकतर लोगों ने ज़िम्मेदारी का परिचय दिया और उस घटना को “निर्भया” के नाम से जाना गया, जो कि पीड़ित लड़की का असली नाम नहीं था। यानी यहां भी पीड़ित लड़की का नाम, चेहरा, जाति, धर्म सामने रखकर लड़ाई नहीं लड़ी गई।

अब 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में भी एक नृशंस घटना घटी है। ऐसी घटनाओं का कोई भी सभ्य व्यक्ति समर्थन नहीं कर सकता, न ही ऐसा सोच सकता है कि गुनहगारों को सज़ा न मिले। फिर वे कौन लोग हैं, जो चीख-चीखकर पीड़ित लड़की का नाम, चेहरा, धर्म बार-बार दुनिया को बता रहे हैं? इंसाफ़ का तो कोई विकल्प नहीं हो सकता, लेकिन क्या इंसाफ़ की यह लड़ाई लड़ते हुए देश के कानून और मर्यादाओं का भी कुछ ख्याल रखा जाएगा या नहीं?

मेरे ख्याल से कठुआ की लड़ाई जिस तरह से लड़ी जा रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे ऐसा लग रहा है, जैसे यह एक बलात्कार पीड़िता को इंसाफ़ दिलाने की लड़ाई नहीं, बल्कि दो संप्रदायों या फिर दो राजनीतिक धड़ों की लड़ाई हो, जिसे इंसानी लाशों अथवा वोटों के सौदागर चील-गिद्धों की तरह झपट्टे मार-मार कर लड़ रहे हैं। इसी का नतीजा है कि बलात्कार और हत्या जैसी नृशंस घटना के ज़िक्र में भी संप्रदाय का हवाला दे-दे कर तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई है।

मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले चीख-चीख कर बता रहे हैं कि एक मुस्लिम लड़की के साथ एक हिन्दू मंदिर में यह अपराध हुआ है। दूसरी तरफ़ हिन्दू वोट बैंक की राजनीति करने वाले भी ताल ठोंककर बता रहे हैं कि तुम्हारे मौलवियों ने मस्जिदों और मदरसों में क्या-क्या किया है, ज़रा उसका भी ख्याल कर लो। वे करीब-करीब एक ही समय में घटी बिहार के सासाराम और असम की कुछ घटनाओं के भी उदाहरण दे रहे हैं और अन्य अनेक घटनाओं का भी ज़िक्र कर रहे हैं।

एक तरफ़ संप्रदाय की लड़ाई, दूसरी तरफ़ राजनीतिक धड़ों की लड़ाई। बीजेपी के विरोधी जहां अचानक धर्मात्मा बन गए हैं, वहीं बीजेपी के समर्थक भी उन धर्मात्माओं को उनके कुकर्मों की याद दिलाने में जुट गए हैं। मेरा सवाल है कि कौन-सी पार्टी इस देश में ऐसी है, जिसके भीतर बलात्कारी नेताओं की पैदावार नहीं रही है? कौन-सी पार्टी इस देश में ऐसी है, जिसके विविध नेताओं के सेक्स-स्कैंडलों की सीडी अब तक सामने नहीं आई है? और कौन-सी पार्टी इस देश में ऐसी है, जिसने समय-समय पर अपने उन पतित नेताओं को बचाने की कोशिशें नहीं की? फिर यहां कौन है, जो धर्मात्मा है?

इसलिए, जब कठुआ की पीड़ित लड़की के इंसाफ़ की लड़ाई को धर्म और राजनीतिक धड़ों के आधार पर लड़ा जा रहा है, तो एक नागरिक के तौर पर मेरी शर्मिंदगी और भी कई गुणा बढ़ जाती है। क्या एक देश और समाज के तौर पर गिरते-गिरते हम पिछले 70 साल में इतना नीचे गिर चुके हैं कि अब बलात्कार और हत्या जैसे संगीन मामलों में भी बहस को नीचता की ऐसी पराकाष्ठाओं के पार ले जाएंगे?

एक और अजीब बात है। यूपी, बिहार, दिल्ली, हरियाणा कहीं की भी पुलिस हो, तो हम उस पर आसानी से यकीन नहीं करते, लेकिन जम्मू-कश्मीर की पुलिस पर कतिपय बुद्धिजीवियों को इतना ज़बर्दस्त भरोसा है कि लगता है पूरे देश को जम्मू-कश्मीर पुलिस के ही हवाले कर देना चाहिए। जम्मू-कश्मीर पुलिस की चार्जशीट को पुराण, कुरान, गुरुग्रंथ और बाइबिल से भी अधिक पवित्र और सच्चा मान लिया गया है। जबकि मेरा मानना है कि अगर स्थानीय लोग उसपर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो उनकी भी बात सुनी जानी चाहिए और मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कराई जानी चाहिए।

ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि जब भी आप अपराध की एक घटना को जाति, धर्म या राजनीति का रंग दे देते हैं, तो इंसाफ़ की उम्मीद उल्टे धूमिल हो जाती है, क्योंकि अगर पीड़ितों के पक्ष में जाति, धर्म और सियासत के सूरमा खड़े हो जाते हैं, तो आरोपियों को भी जाति, धर्म और सियासत का रक्षा-कवच हासिल हो जाता है। हमने ऐसा उन कितने ही मामलों में होते देखा है, जिसमें जबरन हिन्दू-मुसलमान या दलित-पिछड़े का एंगल घुसेड़ा गया।

चिंताजनक यह भी है कि आज इस देश में स्पष्ट तौर पर दो धड़े दिखाई दे रहे हैं, जो चयनित रूप से अपनी संवेदनाओं का इज़हार करते हैं। ये दोनों धड़े अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से हर घटना को जाति या धर्म का रंग दे देते हैं। यह स्थिति चुनावी जीत का गणित तैयार करने के लिए राजनीतिक दलों को अवश्य सूट कर सकती है, लेकिन देश के भीतर जातीय और सांप्रदायिक सौहार्द्र के वातावरण पर इससे जो बुरा असर पड़ रहा है, वह ख़तरनाक है।

स्थिति यह है कि जिस लोकतंत्र को हमने इस देश का सौभाग्य समझकर अंगीकार किया, वही मौजूदा चुनावी प्रणाली के रूप में इसके दुर्भाग्य की कहानी लिख रहा है। चूंकि देश में हमेशा कहीं न कहीं चुनाव होते ही रहते हैं, इसलिए राजनीतिक दलों और उनके एजेंट बुद्धिजीवियों द्वारा ऐसी घटनाओं की आग में जाति और धर्म की हवा झोंकने का सिलसिला भी चलता ही रहता है। यह स्थिति देश में जलवायु प्रदूषण से भी अधिक दमघोंटू वातावरण तैयार कर रही है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो एक दिन देश में गृहयुद्ध छिड़ जाएगा और इसके लिए हम सभी ज़िम्मेदार होंगे।

अभिरंजन कुमार(जाने-माने पत्रकार और कवि व मानवतावादी चिंतक )

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