और हार गए सुरेन्द्र दास, लेकिन डा. रवीना भी जीत नहीं पायी

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ऐसी लड़ाई क्यूं लड़ते रहे सुरेन्द्र जिन्दगी से क्यूं भागे …रवीना से भाग जाते …

लगातार कई दिनों तक जिंदगी और मौत से लड़ रहे जंग को एस पी  सुंरेंद्र हार गए    … घुटन और अवसाद के जंजाल से निकलने का जो रास्ता सुरेंद्र ने चुना वो केवल और केवल मौत के पास जाता था    .. लेकिन सुरेंद्र अपनी मौत से पहले कहाँ-कहाँ अपनी लड़ाई हार चुके थे इसपर गौर करना जरूरी है   … हालाँकि सुरेंद्र ने जो रास्ता चुना वो कहीं से भी जायज नहीं कहा जा सकता लेकिन ये भी कहना जायज ही होगा कि निश्चित ही सुरेंद्र जिंदगी के उस चौराहे पर खड़े दिख रहे थे जहाँ से हर रास्ता  उन्हें बंद दिख रहा था  ..
 सुनिये जरा …सुरेन्द्र के शब्दों में ………..
     प्रिय रवीना — आयी लव यू —-
     तुम साथ नहीं छोड़ोगी ,इसलिए मैं दुनिया छोड़ रहा हूँ।
     तुम विश्वास नहीं करोगी, मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ 
     चाहता तो कुछ दिन और गुजर सकते थे लेकिन तुम नहीं बदले 
     मैंने प्यार और तुमहारे  लिए समझौते किये ,लेकिन तुमने शक नहीं छोड़ा  
     तुम अपना रवैया और मेरा साथ नहीं छोड़ोगी ,इसलिए जिंदगी छोड़ रहा हूँ 
     जहर खा रहा हूँ ,लेकिन जिम्मेवार खुद हूँ ,किसी को तंग ना किया जाये   . 
ये वो कुछ खास पंक्तियाँ है जिसे एस पी  सुरेंद्र ने आत्महत्या से पहले अपनी पत्नी के नाम सुसाइड नोट में लिखा था   … एस पी सुरेंद्र ने जहर खाने के बाद से लेकर मौत के दिन तक जिस तरह संघर्ष किया उससे कहीं ज्यादा और तनावपूर्ण लड़ाई उस वक्त तक लड़ते रहे जबतक  वो जीने की  चाह से खुद को जोड़े रखा  .. खुद को जोड़े रखा अपनी उस पत्नी रवीना से जिसे वो बेहद प्यार करते थे  … सुरेंद्र अपनी पत्नी को बार-बार विश्वास दिलाने की कोशिश करते रहे लेकिन रवीना उनकी जासूसी से बाज नहीं आयी  …  डॉ रवीना सुरेंद्र की निजी जिंदगी में बेवजह घुसकर अपने दाम्पत्य जीवन को नरक बना चुकी थी  …. अपनी बेगुनाही और प्यार की सच्चाई की गुहार रवीना से लगाते  रहे पर रवीना का दिल नहीं पसीजा  .. और एक दिन सुरेंद्र ने अपनी जिंदगी के चैप्टर को बंद करने का फैसला ले लिया  ….
 
डॉ रवीना से बेहद प्यार करते थे सुरेंद्र 
रवीना  डॉक्टरी छोड़ पति के साथ रहती थी 
रात में गस्ती के समय भी रवीना साथ होती थी 
प्रायः छोटी -छोटी बातों पर  दोनों में विवाद होते थे
सुसाइड से पहले भी मार्केटिंग के लिए हुआ था विवाद  
जिस वक्त एस पी सुरेंद्र ने जहर खाया , पत्नी डॉ रवीना भी साथ थी , जन्माष्टमी को लेकर लड्डू गोपाल के वस्त्र लाने को लेकर जो झगड़ा पति-पत्नी के  बीच हुआ  ..उसका अंजाम सुरेंद्र की मौत पर जाकर ख़त्म हुआ   … लगातार पांच दिनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ते रहे  .. उनके हर चाहनेवाले ने उपरवाले से दुआ की   … लगभग 16 आई पी एस साथियों ने चौबीसो घंटे सुंरेंद्र की सलामती के लिए प्रयास किया ,……..चाहे तुझको रब बुला ले ,हम ना रब से डरनेवाले ,जाने तुझे देंगे नहीं  ….. ये गाना जो कभी थ्रीइडिएट में अपने मित्र को बचाने की जंग लड़ते दोस्तों की कोशिश को याद दिला रुला सा देता है वही कुछ सुरेन्द्र के 16 आई पी एस दोस्तों के द्वारा  की गयी  कोशिश भी साबित कर रहा था … कुछ समय के लिेए उम्मीद भी जगी पर वो भी दगा दे गयी …  , लेकिन उस समय सबकी उम्मीदें ख़त्म हो गयी जब अस्पताल के डॉक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर दिए   .. और इस तरह  जीने की असीम चाहतों के साथ सुरेंद्र जिंदगी की जंग हार गए    …
देखिए जिन्दगी के जद्दोजहद को …….
सुरेंद्र ने मौत के तरीके को तलाशा 
गूगल पर भी आत्महत्या को तलाशा 
ब्लेड से नस काटना और जहर खाने को सोचा 
नस काटने से होनेवाले दर्द की जगह जहर को चुना 
सुरेंद्र दास की रवीना से  लड़ाई काफी ज्यादा हुआ करती थी  .. बीचबचाव में परिवार -रिश्तेदार आते थे  .. लेकिन 4 सितम्बर को जो विवाद हुआ उसे परिवार और रिस्तेदार भी नहीं सुलझा पाए  .. आखिरकार अब इस कहानी को एक दुखद अंत देखना था  .. सुरेंद्र दास  ख़ुदकुशी के लिए अपने ही कर्मचारी से चूहा मारने के नाम जहर सल्फास मंगा चुके थे   .. आखिरकार सल्फास के तीन पाउच को सुरेंद्र  ने खा लिया और अपने हाथों लिखा सुसाइड नोट पत्नी डॉ रवीना के हाथ थमा दिया   …..
  
डॉ सुरेंद्र —  — “ये लो जो खत तेरे लिए लिखा है  .. पढ़ लेना” 
रवीना  —   —” जब आप ही नहीं रहेंगे तो इस खत का मैं क्या करुँगी  … ?”
और इन दो पंक्तियों के वार्तालाप के बाद ही सुरेंद्र की हालत ख़राब होती चली गयी   .. पेशे से  डॉक्टर होने की वजह से रवीना ने उल्टियां भी करवाई लेकिन  हालत नहीं सुधरे तो अस्पताल लेकर गए  जहाँ दिनोदिन सुरेंद्र की स्थिति बिगड़ती ही चली गयी  … और वो आखिरी वक्त भी आ गया जॉब सुरेंद्र सबसे विदा हो लिए   .. रह गयी तो सिर्फ उनकी यादें  ..
 छोटे छोटे विवादों और झगड़ों ने दो परिवारों की कई जिंदगियों को तबाह कर दिया  .. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है  .. इसके पहले भी काम की आपाधापी और जिंदगी की  भागदौड़ में कुछ ने खुद को हालात के सहारे छोड़ दिया तो कुछ ने खुद को मौत के हवाले कर दिया  .. और शायद पारिवारिक विवादों में जब शक और संदेह की कोई चिनगारी आग लगाती है तो सुरेंद्र की तरह कई लोग हिम्मत हार देते हैं  …….

 

                       

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