आबादी पर संग्राम, जायज या फिर वोट बैंक की रणनीति ?

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आबादी नियंत्रण पर देश को एक होना होगा,सियासत से बाज आये लोग।

जब-जब देश में चुनावी शतरंज की बिसात बिछायी जाती है,वहां कुछ प्यादे ऐसे तैयार किये जाते हैं जो अपने सिपहसालार के ही इशारे या योजना के अनुसार कुछ ऐसे तीर चला जाते हैं जिससे पूरे देश में एक बड़ी बेकार बहस खड़ी हो जाती है। विश्वजनसँख्या दिवस के मौके पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कुछ ऐसा ही तार छेड़ दिया है जो अचानक देश का एक ख़ास और सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। अब योगी आदित्यनाथ के बयान के बाद फिर कई बयानवीरों ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखनी शुरू कर दी।
मुद्दा है देश की बढ़ती विस्फोटक जनसंख्या और इसके ऊपर लगाम लगाने की बात,लेकिन मुद्दे को जोड़ा जा रहा है धर्म और सामाज से। कहीं ये मुद्दा अभी चुनावी तो नहीं?कहीं ये मुद्दा ध्रुवीकरण का तो नहीं ?खासकर सवाल तब उठता है जब अचानक भाजपा और संघ के सारे लोग एक सुर में एक ही गाना गाने लगें। हलाकि हिंदुत्व के कट्टर सियासी नेता चाहे वो केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह हों या फिर साध्वी निरंजना इस तरह के सख्शियतों ने हर बार मुस्लिम आबादी पर बयान देकर विषय को हल्का कर दिया और विरोधियों खासकर तथाकथित सेक्युलर लोगों को प्रहार करने का भी मौका दे दिया। होना ये चाहिए कि सरकार जो भी हों उन्हें गंभीरता से इसे सामाजिक संकट मानकर आंदोलन के रूप में चलाये तो शायद कुछ सफलता इस दिशा में मिल सकती है। पिछले साल वर्तमान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने इसी जनसँख्या दिवस पर कहा था कि उनकी सरकार कुछ राज्यों को टारगेट बनाकर लगभग डेढ़ सौ जिलों में इस पर काम कर रही है जहाँ विकास ,अशिक्षा,स्वास्थ्य कारणों से आबादी में अचानक बढ़ोतरी आयी है और लगातार बढ़ती जा रही है।उच्‍च टीएफआर(टोटल फर्टिलिटी रेट) वाले सात राज्‍यों के146 जिलों पर ध्‍यान केन्‍द्रि‍त करने के लिए ‘मिशन परिवार विकास’का शुभारम्भ नड्डा जी ने किया था।श्री नड्डा ने कहा था कि मिशन परिवार विकास मंत्रालय की ऐसी नई पहल है,जिसके तहत सेवाओं के प्रावधान,प्रोत्‍साहन योजनाओं,वस्‍तु सुरक्षा,क्षमता बढ़ाना,सुलभ वातावरण और गहन निगरानी के जरिये बेहतर पहुंच पर ध्‍यान केन्द्रित किया जाएगा। श्री नड्डा ने इन जिलों के लिए सूक्ष्‍म योजना तैयार करने और टीएफआर की समस्‍या से निपटने के लिए आवश्‍यकता आधारित कार्यक्रम तैयार करने के लिए टीम की खूब तारीफ़ की थी।स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने अधिकारियों को कार्यक्रम की अर्ध-वार्षिक समीक्षा करने का भी सुझाव दिया था।उन्‍होंने कहा था कि ‘हमने लोगों की बदलती आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए गर्भ निरोधकों में बढोत्‍तरी की है और गुणवत्तापरक सेवाएं तथा ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अंतिम उपभोक्‍ता तक वस्‍तु आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाये हैं।’और ये सब किया गया था बढ़ती आबादी पर रोक लगाने के लिए। यहाँ सवाल उठता है कि पिछले साल जो बाते नड्डा जी ने की थी वो अब इस बार उन जिलों में हुए काम का कोई जायजा पेश करेंगे? इस योजना का कितना असर पड़ा,जनसख्या बढ़ोतरी की दर में कितनी गिरावट आयी? अगर अपेक्षानुसार परिणाम मिला तो इसे वृहत स्तर पर क्या लागू नहीं किया जा सकता ?या फिर इसकी जगह केवल मुद्दे को महज गरमाने की कोशिश में उत्तेजक बयान दे देनेभर से हम जनसँख्या दर कम करने में कामयाब हो जायेंगे।
अब योगी आदित्यनाथ ने’एक देश एक विधान’ की चर्चा कर कई लोगों को बोलने का मौका दे दिया है। खासकर वोटों की राजनीती,मुस्लिम वोटों के स्थानांतरण और हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण इस विन्दु से योगी के बयां को जोड़कर व्याख्या की जा रही है। विरोधी जहाँ इसे वोटों की रणनीति बता रहे हैं वही कई इस्लामिक संगठनो और नेताओं ने इस तरह के किसी भी योजना को ख़ारिज करते हुए कहा है कि इस्लाम में बच्चे पैदा करने पर पाबन्दी मजहब के खिलाफ है। उनके अल्लाह कहते है खूब आबादी बढ़ाओ। अधिक बच्चे पैदा करने वाला अल्लाह के करीब हो जाता है और गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल इस्लामी तालीमों के खिलाफ है। जबकि इस्लाम की तालीमों में बिलकुल ऐसी बात नहीं है जो मुल्ला-मौलवी बतातें हैं। इस्लाम की पूरी तालीम छोटा परिवार रखने, अपने औलाद को अच्छी तरबीयत देने, उन्हें पढ़ा-लिखा कर लायक बनाने की है।
देश की जनसँख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है ऐसे में जरूरत है कि देश में एक ऐसी योजना तैयार हो जो किसी भी धर्म, समाज या वर्ग के मौलिक अधिकारों को चोट पहुंचाए बिना सर्वानुमति से लागू किया जा सके।
हमें सबक लेना चाहिए उन देशों से जिसने अपनी विस्फोटक जनसंख्या पर नियंत्रण पाया ,ऐसे नियम बनाये जिसे हर नागरिक और हर परिवार ने अपनाया। एक समय था जब नसबंदी का नियम लागू कियागया था,वो एक तुगलकी फरमान की तरह था और उस समय इसका भरपूर दुरुपयोग भी हुआ। कुछ ऐसा भी अब नहीं होना चाहिए।
‘सबको सूचित कर दीजिए कि अगर महीने के लक्ष्य पूरे नहीं हुए तो न सिर्फ वेतन रुक जाएगा बल्कि निलंबन और कड़ा जुर्माना भी होगा। सारी प्रशासनिक मशीनरी को इस काम में लगा दें और प्रगति की रिपोर्ट रोज वायरलैस से मुझे और मुख्यमंत्री के सचिव को भेजें।’यह टेलीग्राफ से भेजा गया एक संदेश है। इसे आपातकाल के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने अपने मातहतों को भेजा था। जिस लक्ष्य की बात की गई है वह नसबंदी का है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि नौकरशाही में इसे लेकर किस कदर खौफ रहा होगा.

आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने जोर-शोर से नसबंदी अभियान चलाया था। इस पर जोर इतना ज्यादा था कि कई जगह पुलिस द्वारा गांवों को घेरने और फिर पुरुषों को जबरन खींचकर उनकी नसबंदी करने की भी खबरें आईं। जानकारों के मुताबिक संजय गांधी के इस अभियान में करीब 62 लाख लोगों की नसबंदी हुई थी। बताया जाता है कि इस दौरान गलत ऑपरेशनों से करीब दो हजार लोगों की मौत भी हुई।क्या अंजाम निकला इस तरह के फरमान से?

1933 में जर्मनी में भी ऐसा ही एक अभियान चलाया गया था। इसके लिए एक कानून बनाया गया था जिसके तहत किसी भी आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की नसबंदी का प्रावधान था। तब तक जर्मनी नाजी पार्टी के नियंत्रण में आ गया था। इस कानून के पीछे हिटलर की सोच यह थी कि आनुवंशिक बीमारियां अगली पीढ़ी में नहीं जाएंगी तो जर्मनी इंसान की सबसे बेहतर नस्ल वाला देश बन जाएगा जो बीमारियों से मुक्त होगी। बताते हैं कि इस अभियान में करीब चार लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई थी। 1975 से पहले भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर इस बात का दबाव बढ़ने लगा था कि भारत नसबंदी कार्यक्रम को लेकर तेजी दिखाए। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और एड इंडिया कसॉर्टियम जैसे संस्थानों के जरिये अपनी बात रखने वाले विकसित देश यह संदेश दे रहे थे कि भारत इस मोर्चे पर 1947 से काफी कीमती समय बर्बाद कर चुका है और इसलिए उसे बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने के लिए यह कार्यक्रम युद्धस्तर पर शुरू करना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत में काफी समय से जनसंख्या नियंत्रण की कई कवायदें चल भी रही थीं। गर्भनिरोधक गोलियों सहित कई तरीके अपनाए जा रहे थे, लेकिन इनसे कोई खास सफलता नहीं मिलती दिखी। और आज हालत ये हैं कि जिस संकट की बात उस समय की गयी थी वो अब भयानक विकराल रूप ले चुका है।

अब आज फिर इस बहस को उसी मोड़ पर लाकर बवाल मचाया जा रहा है। जनसँख्या पर नियंत्रण की बात को जहाँ इस्लामिक जगत के कुछ कठमुल्ले और मौलबी इस्लामिक जनसँख्या घटाने की साजिश बता रहे हैं वहीँ सियासत के खिलाडी भी इसे ध्रुवीकरण या फिर एक और ऐसी चाल बता रहे हैं जिससे वर्त्तमान सरकार की पहल को झटका लगे और ये महज सियासी खेल भर बनकर रह जाये। दूसरी तरफ जिनके पास फिलहाल इस तरह के काम का जिम्मा है उन्ही के लोग सरकार की किरकिरी भी कराने में लगे हैं। ऐसे समय में तंत्र से जुड़े लोगों को इस ओर पहल करने की जरूरत है जिससे किसी खास कौम संप्रदाय को उसके खिलाफ कोई साजिश भी नजर नहीं आये। और पूरे देश में जनसँख्या की बढ़ोतरी के कारणों पर उपाय खोज कर एक कठोर नियम भी बनाया जाये जिससे आज को तो नहीं कम से कम भविष्य को कुछ हद तक ठीक किया जा सके।

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