Feb 2, 2017

हर आपराधिक मामले में दोबारा सुनवाई का आदेश नहीं दे सकते – सुप्रीम कोर्ट

Media Sarkar Desk

Share This

सुप्रीम अदालत ने पटना हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द कर दिया और कहा है कि हर आपराधिक मामले में दोबारा सुनवाई का आदेश नहीं दिया जा सकता। हम सिर्फ उन्हीं केसों की दोबारा सुनवाई करवा सकते हैं, जिनमें न्याय की हत्या (मिसकैरिज ऑफ जस्टिस) हुई हो।जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस आर भानुमति ने कहा, “अक्सर हाईकोर्ट हर उस आपराधिक मामले में रि-ट्रायल का आदेश देते हैं, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर हो जाए। यह गलत परंपरा है। यह बेंच भागलपुर में दहेज हत्या के एक मामले की सुनवाई कर रही थी और इसी मामले में यह आदेश जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से आरोपियों की याचिका पर दोबारा विचार करने को कहा।

ये है पूरा मामला

मामला भागलपुर का है और तिलकामांझी थाना पुलिस ने असीम कुमार चटर्जी की शिकायत पर दर्ज किया था।शिकायतकर्ता ने अपने जीजा, उनके पिता और माता पर दहेज के लिए अपनी बहन को प्रताड़ना देने और उसकी हत्या करने का आरोप लगाया। इस सिलसिले में दहेज हत्या का मामला 15 मई 2007 को दर्ज किया था। शिकायतकर्ता के अनुसार उसकी बहन बांधवी घोषाल की शादी 3 फरवरी 2007 को राजकुमार घोषाल के साथ हुई थी। शादी के बाद से ही उसकी बहन को दहेज के लिए तंग किया जा रहा था। 15 मई को उसे उसकी बहन की मौत की सूचना मिली तो उसने देखा कि उसकी बहन के हाथ की नसें कटी हुई थी और गले में फांसी का निशान था। पुलिस ने सभी आरोपियों को मामले में गिरफ्तार किया था। भागलपुर जिला अदालत ने 9 अप्रैल 2015 को तीनों आरोपियों को दहेज हत्या के मामले में दोषी करार देते हुए उन्हें 10 साल कैद की सजा सुनाई थी। इस निर्णय को उन्होंने पटना हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। जहां पर हाईकोर्ट ने 28 अगस्त 2015 को इस केस की जांच में लापरवाही बरतने का हवाला देते हुए केस की निचली अदालत द्वारा दोबारा सुनवाई किए जाने का आदेश सुनाया था। हाईकोर्ट के इस फैसले को आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने फैसला देने में गलती की- जस्टिस मिश्रा
रि-ट्रायल सिर्फ तभी करवा सकते हैं, जहां लगे कि सुनवाई अधिकार क्षेत्र के बाहर के किसी न्यायिक अधिकारी ने की है या निचली अदालत ने सबूत और गवाह की अनदेखी की हो। जांच की जिन कमियों से मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ा, वह दोबारा सुनवाई का आधार नहीं हो सकती।’
जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि पटना हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी की लापरवाहियों का हवाला तो तो दिया है। लेकिन यह नहीं बताया कि न्याय की हत्या करने वाली यह खामियां कौन सी हैं। आरोपी की अपील पर हाईकोर्ट का कर्तव्य बनता है कि सबूतों के आधार पर खुद स्वतंत्र निष्कर्ष पर पहुंचे।पटना हाईकोर्ट ने फैसले में गलती की है। इसलिए हम हाईकोर्ट के 28 अगस्त 2015 के उस फैसले को रद्द करते हैं, जिसमें दहेज हत्या के दोषियों के खिलाफ मामले की दोबारा सुनवाई का आदेश जारी किया गया था।
Facebook Comments

Article Tags:
·
Article Categories:
Big Breaking

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*