Oct 15, 2016

मनमोहन से 18 रुपये लीटर महंगा पेट्रोल और डीज़ल बेच रहे हैं मोदी!

Abhiranjan Kumar @talk2abhiranjan

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अभिरंजन कुमार जाने-माने पत्रकार, कवि और चिंतक हैं।

अभिरंजन कुमार जाने-माने पत्रकार, कवि और चिंतक हैं।

पेट्रोल और डीज़ल के दाम फिर बढ़ गए हैं और बढ़ते-बढ़ते लगभग उसी स्तर पर पहुंच गए हैं, जिस स्तर पर मनमोहन सरकार के समय इनके दाम थे। यह हाल तब है, जब मनमोहन सरकार के समय की तुलना में आज अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत करीब आधी ही है।

यूं कहने को तो सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल के दामों को डीरेगुलेट कर दिया है और अब इनके दाम बढ़ाने-घटाने का काम तेल कंपनियां करती हैं। लेकिन ऐसा कहना पूरे मामले का ऐसा सरलीकरण है, जो आम जनता को बेवकूफ़ बनाने के सिवा और कुछ नहीं। सच्चाई यह है कि पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ाने में केंद्र और राज्य सरकारों दोनों का पूरा-पूरा हाथ है।

केंद्र सरकार एक्साइज़ ड्यूटी के ज़रिए, तो राज्य सरकारें वैल्यू ऐडेड टैक्स के ज़रिए, पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ाती हैं, और इन दोनों ने मिलकर ऐसा जाल बुन रखा है कि डीलर्स कमीशन जोड़कर जो पेट्रोल आज की तारीख में 30.90 रुपये प्रति लीटर (बिना एक्साइज़ ड्यूटी और वैट जोड़े) का होता है, आम आदमी आज उसे 66.53 रुपये प्रति लीटर (दिल्ली) में ख़रीदने को मजबूर है। जबकि डीलर्स कमीशन जोड़कर जो डीज़ल आज 29.90 रुपये प्रति लीटर (बिना एक्साइज़ ड्यूटी और वैट जोड़े) का होता है, आम आदमी उसे 55.44 रुपये प्रति लीटर (दिल्ली) में खरीद रहा है।

यानी केंद्र और राज्य सरकारों के शुल्कों और करों की वजह से पेट्रोल के दाम 35 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल के दाम 25 रुपये प्रति लीटर से भी ज्यादा बढ़ जा रहे हैं। यानी केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर पेट्रोल पर 115 प्रतिशत और डीज़ल पर 85 प्रतिशत ड्यूटी एवं टैक्स वसूल रही हैं। यानी कोई सरकार किसी वस्तु पर इतना अधिक टैक्स लगा सकती है, यह आम लोगों की सोच और कल्पना से भी बाहर की बात है। जैसे पेट्रोल और डीज़ल न हुआ, सिगरेट और शराब हो गई!

और यह उस दौर में हो रहा है, जब सरकार टैक्स-व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने की बात कर रही है। देश की संसद के दोनों सदनों में जीएसटी कानून पास हो चुका है, और देश भर में इसे लागू करने के लिए औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं। यह अलग बात है कि तेल के दामों को जीएसटी के दायरे में लाने की सरकार की कोई मंशा नहीं है, क्योंकि जीएसटी के दायरे में इसे लाते ही 115 प्रतिशत और 85 प्रतिशत टैक्स इम्पोज़ करने वाली यह लूट रुक जाएगी।

सवाल उठता है कि पेट्रोल और डीज़ल को अगर जीएसटी के दायरे में नहीं लाया जाएगा, तो फिर इनपर कितने टैक्स को तर्कसंगत माना जा सकता है? इसे समझने के लिए वह दौर याद कीजिए, जब बीजेपी विपक्ष में थी और महंगाई को लेकर मनमोहन सरकार के ख़िलाफ़ लगातार हमलावर मुद्रा में थी। इस महंगाई में पेट्रोल और डीज़ल के अधिक दाम भी उसके निशाने पर रहते थे। इसलिए हम यह मान सकते हैं कि मनमोहन सिंह की सरकार पेट्रोल और डीज़ल पर जितनी एक्साइज़ ड्यूटी वसूलती थी, मोदी की सरकार में अगर उससे अधिक एक्साइज़ ड्यूटी वसूली जाती है, तो वह तर्कसंगत नहीं कही जा सकती।

गौरतलब है कि मनमोहन सिंह की सरकार जाते-जाते एक लीटर पेट्रोल पर 9.48 रुपये और एक लीटर डीज़ल पर 3.65 पैसे एक्साइज़ ड्यूटी वसूलती थी। जबकि मोदी सरकार आज एक लीटर पेट्रोल पर 21.48 रुपये और एक लीटर डीज़ल पर 17.33 रुपये एक्साइज़ ड्यूटी वसूल रही है, जो कि पिछली सरकार की तुलना में पेट्रोल के मामले में दोगुने से भी ज़्यादा और डीज़ल के मामले में चौगुने से भी ज़्यादा है।

अब अगर यह मान लें कि मोदी सरकार भी मनमोहन सरकार जितनी ही एक्साइज़ ड्यूटी वसूले और राज्यों द्वारा लगाया जाने वाला वैट शून्य हो, तो आज एक लीटर पेट्रोल का दाम 40.38 रुपये (30.90 रुपये + 9.48 रुपये) होता, जबकि एक लीटर डीजल का दाम 33.55 रुपये (29.90 रुपये + 3.65 रुपये) ही होता।

अब बात करते हैं राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले वैट की। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ केंद्र सरकार ने ही पेट्रोल और डीज़ल पर अतार्किक तरीके से एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाई है। राज्य सरकारें भी आम जनता से मनमाने तौर पर वैट ऐंठ रही हैं। यहां विस्तार से बचने के लिए हम सिर्फ़ दिल्ली सरकार की बात करेंगे। यहां शीला दीक्षित की तथाकथित महंगाई वाली सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन कर जब केजरीवाल जैसे सफेदपोश नेता की सरकार बनी, तो वैट और बढ़ा दिया गया। शीला सरकार में दिल्ली में पेट्रोल पर 20 फीसदी और डीज़ल पर 12.5 फीसदी वैट वसूला जाता था, जबकि केजरी सरकार में पेट्रोल पर 27 फीसदी और डीज़ल पर 16.75 फीसदी वैट वसूला जा रहा है।

अब अगर मान लें कि जैसे मोदी सरकार में मनमोहन सरकार जितनी ही एक्साइज़ ड्यूटी होती, वैसे ही केजरी सरकार में भी अगर शीला सरकार जितना ही वैट होता, तो आज एक लीटर पेट्रोल का दाम होता- 40.38 रुपये + (40.38 x 20%) = 48.45 रुपये। और एक लीटर डीजल का दाम होता- 33.55 रुपये + (33.55 x 12.50%) = 37.74 रुपये प्रति लीटर।

यानी महंगाई के ख़िलाफ़ लड़ने वाले नेताओं और पार्टियों की जब सरकारें बनीं, तो मनमोहन और शीला की कथित महंगाई वाली सरकारों की तुलना में पेट्रोल कम से कम 66.53 रुपये – 48.45 रुपये = 18.08 रुपये प्रति लीटर (करीब 18 रुपये मान लेते हैं) और डीज़ल कम से कम 55.44 रुपये -37.74 रुपये = 17.70 रुपये प्रति लीटर (इसे भी करीब 18 रुपये मान लेते हैं) महंगा है।

सारांश यह है कि आज के दिन पेट्रोल का तर्कसंगत मूल्य 66.53 रुपये प्रति लीटर की बजाय अधिकतम 48.45 पैसे और डीज़ल का तर्कसंगत मूल्य 55.44 रुपये प्रति लीटर की बजाय अधिकतम 37.74 रुपये मात्र है। अब मौजूदा सरकारें आम जनता की इस जेब-तराशी के पीछे जो भी दलीलें दें, उनसे संतुष्ट होना या न होना आप पर निर्भर है।

नोट- यह विश्लेषण हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा मुहैया कराए गए ताज़ातरीन आंकड़ों यानी 16 अक्टूबर 2016 के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है और इसमें दिल्ली राज्य की कीमतों का ज़िक्र किया गया है। अलग-अलग राज्यों में वैट दरों में अंतर के कारण इस विश्लेषण में उपयोग किए गए आंकड़े  दूसरे राज्यों के लिए मामूली रूप से बदल सकते हैं।

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